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08, March

दुनिया की दुर्लभ बीमारी की चपेट में, इस बीमारी के मिले हैं अब तक 150 मरीज

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कानपुर के एक युवक में नसों और मांसपेशियों की दुर्लभ बीमारी न्यूरोमायोटोनिया (आइजेक सिंड्रोम) की पुष्टि हुई है। अभी तक विश्व भर में इस बीमारी से लगभग 150 लोगों के पीड़ित होने के रिकार्ड मौजूद हैं। देश में इस बीमारी से पीड़ित होने वाला यह 22वां मरीज बताया जा रहा है। एनआरआई सिटी निवासी उद्यमी बृज मोहन डालमिया के पुत्र मुदित डालमिया(38) मुंबई में फाइनेंस सलाहकार थे। वर्ष 2015 में उनके शरीर में अकड़न, असहनीय दर्द, मांसपेशियों में ऐंठन होने लगी। मुंबई के डॉक्टरों से राहत नहीं मिली तो कानपुर के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया। यहां दो न्यूरोफजिशियन ने देखा। एक सप्ताह इलाज चला मगर डॉक्टरों को बीमारी समझ में नहीं आई। इसके बाद उन्हें दिल्ली, मुंबई और जयपुर के कई डॉक्टरों को दिखाया। 20 से अधिक डॉक्टरों को दिखाने के बाद वर्ष 2016 में इस बीमारी की पुष्टि हुई। जयपुर के डॉक्टर डॉ.अशोक पनेगेरिया की देखरेख में अब इलाज चल रहा है। इस बीमारी का इलाज नहीं दुनिया में आइजक सिंड्रोम का कोई इलाज नहीं है। बीमारी बढ़े नहीं इसकी दवाएं दी जाती हैं। यह सिंड्रोम शरीर के रोग प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट कर देती है। इम्यून सिस्टम को संतुलित करने, दर्द निवारक अौर स्टेरायड के जरिए मरीज को राहत दी जाती है। मुदित को शुरुआत में 40 से अधिक दवाएं नियमित खानी पड़ीं। इस समय प्लाज्मा ट्रांसफ्यूजन, इम्युनोग्लोबुलिन (आईवीआईजी थेरेपी) दर्द निवारक इंजेक्शन, स्टेरायड के जरिए उन्हें राहत दी जा रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय को आपबीती बताई पीड़ित मुदित ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को अपनी आपबीती बताई है। मुदित का कहना है कि मैं राज्य और केंद्र सरकार का ध्यान इस बीमारी की ओर दिलाना चाहता हूं। मैं तो इलाज के लिए सक्षम था मगर किसी गरीब इंसान या जहां इलाज की सुविधा नहीं है, ऐसे लोगों के लिए इलाज का प्रबंध किया जाना चाहिए। मंत्रालय ने उनकी आपबीती को अपनी पत्रिका में प्रकाशित भी किया। 30 लाख खर्च हुए अब तक मुदित डालमिया के परिजनों के मुताबिक दो वर्षों के इलाज में लगभग 30 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। सरकारी सिस्टम में इसका इलाज नहीं है। निजी अस्पतालों में ही इलाज है जो काफी महंगी है। क्या है न्यूरोमायोटोनिया बीमारी यह न्यूरो से जुड़ी बीमारी है। मरीज की नसों और मांसपेशियों में खिंचाव अौर अकड़न से असहनीय दर्द होता है। चलना-फिरना मुश्किल होने पर मरीज बेड पर पहुंच जाता है। अभी तक जीन में अचानक आए बदलाव से इस बीमारी के चपेट में पहुंचने की बात कही सामने आई है। आमतौर पर 15 वर्ष से 60 वर्ष की उम्र तक यह बीमारी होती है। मगर 30 और 40 वर्ष के बीच इसके लक्षण तेजी से उभरते हैं। यह है बीमारी के लक्षण मांसपेशियों की कठोरता, लगातार मांसपेशियों में ऐंठन, अधिक पसीना अाना, असहनीय दर्द, मांसपेशियों में कमजोरी, जलन, उठने-बैठने में दिक्कत, कमजोरी महसूस, सांस लेने में दिक्कत। क्या कहते हैं विशेषज्ञ न्यूरो फिजिशियन डॉ. पुनीत दीक्षित का कहना है कि यह बीमारी बेहद दुर्लभ है। मांसपेशियां स्थिर नहीं रहती हैं। दर्द से राहत देने के लिए दवाओं की हैवी डोज देनी पड़ती है। बीमारी अागे न बढ़े, इसे दवाओं और थेरेपी के जरिए रोका जा सकता है। इस बीमारी की डायग्नोसिस काफी कठिन और महंगी है। ऐसी ही बीमारी से मिलते-जुलते दो मरीजों और आए हैं, लेकिन अभी उनकी जांचें की जा रही हैं। आइजेक सिंड्रोम की पुष्टि नहीं हुई है।

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