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10, March

मेरीकलम ~..(राहुल पांडेय )

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कर्ण के पिता जब उसे शिक्षा दिलाने के लिए द्रोणाचार्य के पास लेकर गए थे तो द्रोण ने कर्ण को शिक्षा इसलिए नहीं दी थी क्योंकि वह एक रथवान का पुत्र था। एकलव्य के साथ भी यही हुआ... द्रोण ने इन बच्चों की प्रतिभा को जांचने और निखारने का ज़िम्मा लेने की बजाए यह देखा कि उनके माता-पिता कौन थे... हमें लगता है कि हम सभ्यता की नदी में बहुत आगे बह आए हैं लेकिन हाल आज भी वही है। तथाकथित "अच्छे" स्कूल माता-पिता का इंटरव्यू करते हैं... उन्हें झुंड में इकठ्ठा कर उनका "टेस्ट" लिया जाता है और फिर स्कूल माता-पिता के "रिस्पॉन्स" के आधार पर बच्चों को स्वीकारते या नकारते हैं। . . मेरे दृषिकोण से देखें तो यह चलन न केवल शिक्षा के पूर्ण व्यवसाय में बदल जाने का एक चरम बिन्दु है... बल्कि यह बच्चों और तमाम माता-पिता का अपमान भी है। पहली बात तो यह कि बच्चों को स्कूलों में शैक्षिक, मानवीय और नागरिक तौर पर संवरने के लिए भेजा जाता है। आपने यदि स्कूल खोला है तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप उन बच्चों को भी संवारे जो उतने मेधावी नहीं हैं (अन्यथा स्कूल और शिक्षक होते किसलिए हैं?) . . यदि आपके स्कूल में सुविधाएँ अधिक हैं तो आप अधिक फ़ीस लीजिए और यह देखिए कि माता-पिता उस फ़ीस को चुका सकते हैं या नहीं। बच्चों का एक सामान्य टेस्ट और सामान्य इंटरव्यू भी लिया जा सकता है (वह भी सिर्फ़ इसलिए कि यदि उस बच्चे की विशेष परिस्थितियों के लिए कोई अन्य स्कूल बेहतर है तो उसे उस स्कूल में भेजा जा सके)... लेकिन माता-पिता का इंटरव्यू लेकर क्या स्कूल "इंटेलीजेंट" बच्चों की एक अलग "ब्रीड" खड़ी करना चाहते हैं? "सिलेक्शन ऑफ़ द बेस्ट" प्रकृति के लिए ठीक होगा लेकिन हम इंसान हैं... हमें सभी को साथ लेकर आगे बढ़ना है। . . और फिर इतने तमाशे के बाद भी ये "अच्छे" स्कूल क्या पढ़ा रहे हैं और कैसी विद्या दे रहे हैं? क्या इस पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाएगा? "अच्छा" स्कूल के नाम पर माता-पिता से मोटी रकम ऐंठने वाले ये स्कूल कैसे विद्यार्थी उत्पन्न कर रहे हैं? माता-पिता भी केवल यह सोच कर पड़ोसी के सामने सीना चौड़ा कर लेते हैं कि हमारा बच्चा "अच्छे" स्कूल में पढ़ रहा है। वे भी अपनी ज़िम्मेदारी केवल फ़ीस चुकाने और बच्चे को होमवर्क कराने तक सीमित रखते हैं... और "फल" के रूप में "अबोव 90%" की इच्छा रखते हैं। माता-पिता के इंटरव्यू से शुरु हुई कवायद का लक्ष्य अंतत: बच्चे को अच्छा "पैकेज" दिलाना होता है। हम तो मघी देवी और शास्त्री स्कूल से पढ़कर निकले वहां एड्मिसन के लिए कोई टेस्ट नहीं लिया जाता था जो अधिक मार सहने की काबिलियत रखता था उस बच्चे का वहां एडमिसून हो जाता था लकी सर के डंडे आज भी याद आते है खैर इसके बारे में कभी बाद में चर्चा करेंगे पर अब हमारे समय जैसे हालात नहीं रहे है खासकर बड़े सहरो में . एक अरब से अधिक आबादी वाले हमारे देश में अगर आप बेहतरी चाहते हैं तो पूरे समाज का ढंग से शिक्षित होना ज़रूरी है। जबकि हाल यह है कि करोड़ों बच्चे स्कूल नहीं जाते और जो जाते हैं उनके बीच शिक्षा के रूप/उद्देश्य में इतना अधिक फ़र्क है कि पूरा समाज विभिन्न "क्लासों" में बंटता चला जाता है। एक "अबोव 90%" और "अच्छे पैकेज" वाली क्लास बनती है जो मॉल्स और सिनेमाघरों के अक्सर चक्कर काटती है। दूसरी "मिडिल क्लास" है... जिसे दीन-दुनिया से कोई मतलब नहीं -- उसे बस पूरे जीवन घर/गाड़ी/बेटा,बेटी की शादी की चिंता रहती है। और तीसरी तथाकथित "ऐवैं" लोगों की क्लास बनती है... . . मज़े की बात यह है कि इन तीनों क्लासों के लोग नागरिक नियमों को नहीं जानते... भ्रष्टाचार करते हैं... कुरीतियों को आगे बढ़ाते हैं... विभिन्न स्तरों के अपराध करते हैं। जब किसी "अबोव 90%" और "अच्छे पैकेज" वाले व्यक्ति के अपराध में लिप्त पाए जाने की खबर पढ़ता हूँ तो मन में प्रश्न उठता है कि क्या वह भी "अच्छे" स्कूल में पढ़ा था और उस स्कूल ने आखिर उसे क्या सिखाया? . . जो शिक्षा मनुष्य को एक अच्छा इंसान और नागरिक न बना सके... उस शिक्षा का क्या महत्त्व?

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