NEWS FEED

22, March

मेरीकलम = एक व्यक्ति जो एक साज़ का पर्याय बन गया.

NEWS FEED

जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खान शहनाई को मुँह से लगाते थे तो वे उसमें अपनी आत्मा का एक अंश जज़्ब कर देते थे... ख़ान साहब और शहनाई दो जिस्म एक जान हो जाते और इस मिलन से ऐसे सुर फूटते थे जो सुनने वाले के मन में हमेशा के लिए बस जाते थे। बनारस में गंगा मैय्या के किनारे और बाबा विश्वनाथ के मंदिर को अपना घर मानने वाले ख़ान साहब को ज़िन्दगी में बेपनाह मुहब्बत मिली। वे भारत रत्न थे... लेकिन उस शख़्स की सादगी देखिए कि नब्बे बरस की उम्र में मरते समय तक वे बनारस में अपने सादे से घर में ही रहा करते थे। ख़ान साहब चाहते तो दुनिया भर की दौलत उनके क़दमों में बिछ सकती थी... लेकिन संगीत का यह पुजारी... बनारस, सरस्वती, बाबा विश्वनाथ और गंगा का यह भक्त ताउम्र अपने संगीत में डूबा रहा। ख़ान साहब केवल शहनाई के ही शहंशाह नहीं थे... वे जीवन में भी शाहों के शाह थे... क्योंकि सच तो यही है कि "जिनको कुछ नहीं चाहिए, वे साहन के साह" 17 अगस्त 2006 को ख़ान साहब की तबीयत काफ़ी बिगड़ गई। उनकी अंतिम इच्छा थी कि वे इंडिया गेट पर शहीदों को श्रद्धांजली देने के लिए शहनाई वादन करें। वे इंतज़ार करते रहे लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी न हो सकी। 21 अगस्त को उनका निधन हो गया। पूरे देश में राष्ट्रीय शोक की घोषणा की गई और पुराने बनारस में एक नीम के पेड़ के नीचे 21 तोपों की सलामी के साथ उन्हें दफ़्न कर दिया गया। उनकी जान... उनकी शहनाई भी उनके साथ दफ़्न कर दी गई। ख़ान साहब ऐसे व्यक्ति थे कि बीमार पड़ने पर कई बार उनके पास दवाइयों के पैसे भी नहीं होते थे... लेकिन दिल के ऐसे अमीर कि कहते थे "मैं ए.सी. लगे ठंडे कमरे में कैसे आराम से सो सकता हूँ जबकि मेरा पड़ोसी रमज़ान अली गर्मी में अपनी टिन की छत पर पानी डाल कर गुज़ारा करे?" कहा जाता है कि एक बार ख़ान साहब बालाजी मंदिर में पूरे ध्यानमग्न हो आँखें बंद कर शहनाई बजा रहे थे... तभी किसी सुगंध की वह से उनका ध्यान टूटा और उन्होनें भगवान बालाजी को अपने पास खड़ा पाया। जब उन्होनें यह बात अपने मामा को बताई तो मामाजी ने उन्हें एक थप्पड़ इसलिए लगा दिया कि उन्होनें अपना ध्यान भंग कैसे होने दिया! संगीत इन लोगों के लिए साधना और ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम था... बाद में ख़ान साहब ने उस घटना को याद करते हुए कहा था कि "भगवान का कोई मज़हब नहीं होता। भगवान हर मनुष्य के लिए एक है। यह बात मुझे उस दिन समझ में आई जब मैं बालाजी मंदिर में शहनाई बजा रहा था" कुछ अमीर भारतीय अमरीकियों ने उन्हें कहा था कि आप अमरीका आ जाइये... हम आपके लिए सारी सुख-सुविधाओं से भरपूर बड़े से घर का इंतज़ाम कर देंगे और सारा खर्च ख़ुद उठाएँगे। इस पर ख़ान साहब ने हँसते हुए कहा कि उन्हें बनारस पसंद है। भारतीय-अमरीकियों ने कहा कि आप आ तो जाइये हम आपके लिए इतना बड़ा घर बनाएँगे और ऐसा बनाएँगे कि बनारस जैसा ही लगेगा। इस पर ख़ान साहब ने कहा "बनारस तो बना दोगे, लेकिन गंगा कहाँ से लाओगे"? अपने देश, अपने बनारस के प्रति उनका प्रेम ऐसा ही था! ख़ान साहब के तीन बेटे और पाँच बेटियाँ थीं... उन्होनें सोमा घोष नामक एक और लड़की को गोद लिया हुआ था... डॉ. सोमा घोष हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में पारंगत एक जाना-माना नाम हैं। ख़ान साहब हमेशा सादा खाना खाते थे और कार इत्यादि की जगह साइकिल रिक्शा पर ही चलते थे। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने ख़ान साहब को 15 अगस्त 1947 को लाल किले से शहनाई वादन करने के लिए आमंत्रित किया था। उन्होनें हमारे पहले गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 1950 को भी को राग काफ़ी बजाया था। उसके बाद से आप सब जानते ही हैं कि हम 15 अगस्त को उस्ताद की शहनाई सुनने के आदी हो गए... उनकी शहनाई से निकली मंगलध्वनि बरस दर बरस हमारे जश्ने-आज़ादी का इस्तकबाल करती रही। कल ख़ान साहब का 102वां जन्मदिन था...

NEWS FEED


NEWS FEED