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02, March

संपादकीयः खुशी और मातम

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अब खुशी के मौके पर हवा में गोलियां चलाने का घातक रिवाज एक गंभीर समस्या बन चुका है। शादियां ही नहीं, जन्मदिन समारोह, विजय जुलूस या फिर अन्य कोई मौका हो, लोग भूल जाते हैं कि खुशी मनाने का उनका यह तरीका किसी की जान भी ले सकता है। खुशी में इस तरह से गोलियां चलाने की घटनाओं में ऐसा कई बार हुआ है जब गोली लगने से किसी बच्चे, बाराती या वधू पक्ष के किसी सदस्य की जान चली गई, और सारा उत्सव पल भर में मातम में बदल गया। कई बार राहगीर भी ऐसी घटनाओं के शिकार हुए हैं। बुधवार को दिल्ली के दिलशाद गार्डन में घुड़चढ़ी की रस्म के दौरान दूल्हे के एक रिश्तेदार ने गोली चला दी और दूल्हे की मौत हो गई। इसे दुर्घटना कहें या हादसा, समाज के समक्ष यह गंभीर सवाल तो खड़ा होता ही है कि हम खुशी इस तरह क्यों मनाते हैं जो किसी के लिए जानलेवा बन जाती है। एक सभ्य समाज में खुशी मनाने का यही तरीका होना चाहिए, कि हथियार के जरिए ही उसकी अभिव्यक्ति हो? क्या बिना गोलियां चलाए खुशी का इजहार नहीं किया जा सकता? दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश सहित उत्तर भारत के कुछ राज्यों में इस तरह की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। आंकड़ों में देखें तो 2005 से 2014 के बीच देश-भर में पंद्रह हजार से ज्यादा लोग इस तरह की घटनाओं का शिकार हुए थे और इनमें से दो-तिहाई मौतें उत्तर प्रदेश में हुई थीं। दरअसल, खुशी में गोलियां चलाने की घटनाएं ऐसे समाज और संस्कृति की ओर इशारा करती हैं जिसमें अपनी खुशी को ताकत का प्रदर्शन करने और रौब जमाने के अवसर के रूप में भी देखा जाता है। समारोहों में गोलियां चला कर खुशी व्यक्त करने के पीछे कहीं न कहीं भीतर छिपा थोथा दंभ या अहंकार भी होता है जिसे लोग अपनी खुशी के रूप में व्यक्त करते हुए अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं। जैसे पिछले साल उत्तर प्रदेश के एक विधायक ने अपने बेटे की शादी में नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए कई राउंड गोलियां चलाई थीं। सत्ता के नशे में चूर उक्त विधायक को इस बात का जरा भी खौफ नहीं था कि प्रदेश में इस तरह की फायरिंग पर पाबंदी है। इसी तरह मध्यप्रदेश में शस्त्र पूजन के मौके पर खंडवा जिले की कलक्टर ने हवा में गोली चलाई थी। इस कुप्रथा पर रोक लगाने के लिए अदालतों ने कड़ा रुख अपनाया है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों तक ने राज्यों को आदेश जारी किए हैं। यह तो स्थानीय पुलिस को ही सुनिश्चित करना होता है कि कोई भी ऐसी घटना न हो। लेकिन ऐसे मामलों में पुलिस लाचार और लापरवाह ही बनी रहती है। दरअसल, जहां किसी पाबंदी का बड़े पैमाने पर उल्लंघन होता हो, और उसमें समाज के मानिंद लोग भी शरीक हों, वहां पुलिस के लिए पाबंदी का पालन करा पाना बहुत ही मुश्किल साबित होता है। लिहाजा, पाबंदी के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर बड़ी पहल भी जरूरी है। हालांकि ऐसी भी मिसालें सामने आई हैं जिनमें वर और वधू पक्ष, दोनों ने अपने निमंत्रण पत्रों में विवाह समारोह के दौरान फायरिंग न करने और शराब से दूर रहने का अनुरोध बारातियों से किया। इन मिसालों को चलन में बदलने की जरूरत है।

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