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03, March

अश्लीलता निगाह में होती है... राहुल पांडेय की कलम से

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इस तस्वीर को लेकर आजकल काफ़ी हंगामा मचा हुआ है। यह तस्वीर मलयालम पत्रिका "गृहलक्ष्मी" के मार्च 2018 अंक के कवर पर छपी। इसमें मॉडल जिलू जोसेफ़ एक बच्चे को स्तनपान करा रही हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह तस्वीर अश्लील है और कुछ का मानना है कि इसमें कुछ अश्लील नहीं है... इसमें से मातृत्व झलकता है। . . मेरे विचार में यह तस्वीर अधिक-से-अधिक ग़ैर-ज़रूरी हो सकती है लेकिन अश्लील तो किसी भी कोण से नहीं है। यक़ीन नहीं होता कि इस तस्वीर में लोगों को अश्लीलता दिखाई दे रही है! किसी स्त्री के स्तन दिखते ही आपको अश्लीलता का भान होने लगता है? ऐसे में तो सड़क किनारे अपने बच्चे को दूध पिलाती किसी मजदूरन को भी आप अश्लील कहेंगे... जिस तरह सौन्दर्य देखने वाले की आँखों में होता है उसी तरह अश्लीलता भी देखने वाले की आँखों और मन में ही होती है। . . अब आते इस तस्वीर की ज़रूरत पर... यदि हम पुरुष स्त्री-देह के प्रति सहज होना चाहते हैं तो हमें उसे सहज रूप से देखना सीखना ही होगा। सलमान खान कमीज़ उतार देता है तो पुरुषों या स्त्रियों को उसमें अश्लीलता नहीं दिखती... क्यों भला?... क्योंकि हम पुरुष देह को इस तरह देखते के प्रति सजह हो चुके हैं। लेकिन यदि स्त्री अपनी कमीज़ उतार दे तो पुरुषों से सहज नहीं रहा जाता! और यहाँ तो मात्र एक स्तन दिख रहा है -- वो भी पूरा नहीं और शिशु को स्तनपान कराया जा रहा है। ये पुरुष के मन पर निर्भर करता है कि वह इस तस्वीर में स्तन देखे या माँ को देखे। . . यह भी कहा जा रहा है कि जिलू जोसेफ़ अविवाहित हैं और माँ भी नहीं हैं -- सो वे केवल बच्चे को दूध पिलाने का ढोंग कर रही हैं। यह बात ठीक है कि जिलू की जगह यदि यहाँ किसी माँ की उसके शिशु के साथ तस्वीर प्रयोग की जाती तो बेहतर रहता। एक मॉडल का प्रयोग क्यों करना? यह बात मुझे भी ठीक नहीं लगी... लेकिन जो भी हो... मुझे तो इस तस्वीर में एक माँ ही दिखती है। . . "नग्नता" की धारणा का शहरीकरण भी खूब हुआ है। गाँवों में स्त्रियाँ खुले में शौच जाती हैं... नदी/तालाब पर खुले में नहाती हैं... कहीं भी बैठ कर बच्चे को दूध पिलाने लगती हैं... ऐसे में गाँव के पुरुष क्या करते हैं? वे निगाहे फेर लेते हैं लेकिन इन चीज़ों को अश्लील नहीं बताते। गाँवों में अभी भी काफ़ी जगह स्त्रियों को भीड़ के बीच उनका "पर्सनल स्पेस" मिलता है... लेकिन शहरों में स्त्री का ज़रा-सा अंग खुला मिल जाए तो वह अश्लील हो जाता है लोग निगाहे झुकाने की बजाए घूरने लगते हैं। . . एक बार की बात है... मैं दिल्ली में एक ऑटो में जा रहा था... सामने एक लड़की अपनी स्कूटी पर जा रही थी। मेरी नज़र पड़ी कि कपड़ों में से उसके अंतर्वस्त्र बिल्कुल साफ़ दिख रहे थे। उस लड़की से रंगों का चयन करने में चूक हुई थी... और उसे इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि स्कूटी पर लगती हवा के कारण उसका दुप्पटा अपना काम नहीं कर पा रहा था। मैंने तुरंत निगाहे हटा ली और उसके आस-पास के ट्रैफ़िक को देखने लगा। मैंने देखा कि बाइक पर पीछे बैठा एक व्यक्ति लगातार उस लड़की को घूरे जा रहा था। मेरे मन में आया कि ऑटो ड्राइवर को कहूँ कि वह उस लड़की के पास ऑटो रोके ताकि मैं उसे बता सकूँ... लेकिन फिर सोचा कि आखिर मैं उसे कहूँगा क्या?... इसी उहा-पोह के बीच वह लड़की किसी अन्य सड़क पर मुड़ कर दूर चली गई... . . मैं इस कवर तस्वीर का समर्थन या विरोध कुछ भी नहीं कर रहा हूँ। मेरे लिए किसी भी अन्य सामान्य तस्वीर की तरह यह भी एक सामान्य तस्वीर है... . . स्त्री देह के प्रति सहजता होना अति आवश्यक है... पुरुष में काम तब जागना चाहिए जब स्त्री की सहमति हो... मात्र किसी का खुला अंग देख लेने से यदि काम जाग जाए तो हम कैसे पुरुष हुए?... पश्चिम में स्त्री-पुरुष पूर्णतया नग्न होकर समुद्र तटों पर धूप सेकते हैं और कोई किसी को नहीं ताकता... कोई किसी को नहीं छूता... क्योंकि वे सहज हो चुके हैं...

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